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शाहजहांपुर से उर्वेश सिंह की रिपोर्ट

** विद्या के मंदिरों में कमीशन का खेल, किताबों के नाम पर हो रही लाखों की कमाई **
** यूनिफार्म में भी चल रहा कमीशन **

(*उर्वेश सिंह की खास रिपोर्ट*)

शाहजहांपुर/निगोही -शिक्षा सत्र शुरू होते ही स्कूल की दुकाने चल निकली है शिक्षा के नाम पर कस्बे के निजी विद्यालयों में कमीशन की किताबों का लाखों का व्यापार चल रहा है। सरकार के तमाम नियमों को धता बता निजी विद्यालय संचालक अपनी मनमर्जी का पाठ्यक्रम चला रहे हैं।वहीं शिक्षा विभाग और प्रशासन सब कुछ जानते हुए भी जिंदा मक्खी निगल रहा है।
अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में बेहतर शिक्षा देने के नाम पर किस तरह अभिभावकों का शोषण किया जा रहा है। इसकी एक बानगी पाठ्य पुस्तकों के नाम पर चल रहे धंधे से ही लगाया जा सकता है।
लगभग 50 फीसदी विद्यालय संचालकों का कमीशन होता है। इस खेल में मध्यमवर्गीय परिवार के वे अभिभावक पिस रहे हैं जो अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में पढ़ा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह शिक्षा विभाग के अधिकारियों की जानकारी में नहीं हो, लेकिन वे शिकायत नहीं मिलने का बहाना बनाकर कार्रवाई से पल्ला झाड़ लेते हैं।
--------------ऐसे चला रहे कमीशन का खेल-----------

शिक्षा विभाग का नियम है कि सभी विद्यालयों में सरकार द्वारा अनुमोदित पाठ्यक्रम ही चलाया जाना चाहिए। यह पाठ्यक्रम भी कम से कम तीन पुस्तक विक्रेताओं के पास उपलब्ध रहे। लेकिन निजी विद्यालय संचालक इन दोनों ही नियमों की अवहेलना कर रहे हैं।
बड़ी कक्षाओं में तो फिर भी इस नियम की थोड़ी पालना कर लेते हैं, लेकिन कक्षा आठ तक इनकी मनमर्जी का पाठ्यक्रम चलता है। इसके अलावा एक विद्यालय का पाठ्यक्रम एक ही बुक सेलर के पास मिलेगा, जो उन्हें सबसे ज्यादा कमीशन देता है।

-----------कॉलेज से महंगी कक्षा एक से पांच तक की किताबे-------

बच्चों की शुरुआती शिक्षा ही अभिभावकों को महंगी पड़ रही है। निजी विद्यालयों की मोटी फीस और इसके बाद पाठ्य पुस्तकों का खर्च के तले मध्यमवर्गीय परिवार दबते जा रहे हैं। पाठ्य पुस्तक विक्रेताओं के यहां जानकारी करने पर पता चला कि बीए प्रथम वर्ष की पाठ्य पुस्तकों की कीमत ज्यादा से ज्यादा एक हजार रुपए है।
जबकि निजी विद्यालयों के एक से पांच तक के क्लास की किताब-कॉपियों का खर्चा 1500-2500 रुपए हैं। अगर विद्यालय बड़ा हुआ तो यह खर्चा 3000 तक पहुंच जाता है।

-----------10-20 पन्नों की किताब 150-200 रुपए की--------

इन विद्यालयों में चलने वाली किताबों पर कई में अधिकृत प्रकाशक तक का नाम नहीं होता। यही नहीं कई में पब्लिकेशन का नाम नजर नहीं आता। 15-20 पन्नों की किताब की कीमत 150-200 तक ली जाती है। जबकि हकीकत में इन्हें प्रकाशित करने पर 10-20 रुपए का खर्च आता है।

---------नहीं दे रहे नि:शुल्क पुस्तक---------

आरटीई कानून के तहत जिन बच्चों को नि:शुल्क प्रवेश दिया जाता है, उन्हें पाठ्य पुस्तक भी विद्यालय द्वारा ही नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाएंगी। क्योंकि शिक्षा विभाग द्वारा विद्यालयों को दी जाने वाली पुनर्भरण राशि में पाठ्य पुस्तकों की राशि भी शामिल होती है। लेकिन विद्यालय संचालक अभिभावकों की जानकारी के अभाव का फायदा उठाकर पाठ्य पुस्तकों का बोझ भी उन्हीं पर डाल देते हैं।
- निजी विद्यालयों की जिन किताबों की कीमत 500-600 रुपए होनी चाहिए, वो दो से ढाई हजार रुपए में बिक रही हैं। इसके साथ अन्य स्टेशनरी खरीदने का भी दबाव बनाया जाता है। अगर स्टेशनरी लेने से इनकार कर दिया तो पुस्तक भी नहीं दी जाती। अन्य बुक सेलर के पास नहीं मिलने के कारण मजबूरी में अभिभावक को जेब ढीली करनी पड़ती है।
सोनू वर्मा, अभिभावक

- बच्चा जब नर्सरी में पढ़ता था तब उसकी किताबें 1100 रुपए में आईं और अब एलकेजी का कोर्स 2200 रुपए में आ रहा है। मोटी फीस के बाद किताब-कॉपियों का इतना खर्च उठाना मुश्किल होता है। कॉपियों का एक रुपए का कवर भी दस रुपए में मिलता है। स्टेशनरी के नाम पर लूटा जा रहा है।

प्रशांत पाण्डे

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